पारम्परिक तौर पर यह माना गया है कि अदन वाटिका से आदम और हव्वा के निष्कासन के पश्चात् पृथ्वी पर प्रथम और एकमात्र पवित्र परिवार तीन सदस्यों से बनी थी। यीशु की माता मरियम , यूसुफ जो यीशु का पोस-पिता था और यीशु।
आईये हम इस पवित्र परिवार के तीनों सदस्यों के जीवन और कार्यों पर ध्यान करें। इस अध्ययन के अन्त में हम जानेंगे कि आप और हम भी उस पवित्र परिवार के सदस्य बनाये गये हैं।
- मरियम : स्त्रियों मे धन्य, वह एक आदर्श माँ थी । जब मैं किसी माँ को उसके बालक के साथ देखता हूँ तो मेरा ध्यान सीधे यीशु की माता मरियम की ओर चला जाता है। सोचता हूँ वह भी इसी तरह बालक यीशु को गोद मे ले कर दूध पिलाती थी, जगने पर उसे खेलाती थी, नंगा कर उसे नहलाती थी,सेवा करने में कितना आनन्दित होती थी। बार बार चूमती और प्रेम से वस्त्र पहनाती थी। यह सब शारीरिक सेवा के पीछे मरियम के हृदय में एक प्रेरणादायक एवम् भक्तिपूर्ण रहस्य था। रहस्य यह थी – वह जानती थी कि उसके गोद में जो बालक है सो परमेश्वर का पुत्र है। यह ज्ञान उसके प्रेमपूर्ण सेवा कार्य को सौ गुना बढा देता था।
मैं यह भी सोचता हूँ कि प्रत्येक मसीही माता कोअपने बच्चों के प्रतिपालन में ऐसा ही विचार रखना चाहिये कि वह प्रभु की दासी है । उसका बालक परमेश्वर की ओर से है और परमेश्वर के लिये उसको तैयार करना है। यह विचार परिवार को पवित्रता के मार्ग पर ले जाने में सहायक होगी।
क्या कभी आप ने उस माँ के चेहरे को देखा है जिसका बच्चा खो गया हो? मुझे इसका व्यक्तिगत अनुभव है और उसकी याद आने पर आंखें भर आती हैं और मैं गम्भीर हो जाता हूँ। मरियम का बालक जब 12 वर्ष की आयु में खो गया था तब उसकी ममता किस तरह कराह उठी थी, हम अन्दाजा लगा सकते हैं। यदि आप को खोया पुत्र को पाने का अनुभव है , तो आप बहुत अच्छी तरह जान पायेंगे कि एक पापी के मन फिराने से पिता परमेश्वर कैसा आनन्दित होता है।
हर माँ की इच्छा होती है कि बेटा बडा हो कर उसका सहारा बने और अन्त में उसे अर्थी दे कर कब्र तक पहुंचाये परंतु जब माँ को ही बेटे की अन्तिम क्रिया करना पडे तो उसके हृदय विदारक पीडा को कौन समझ सकता है ? अनेक मातायें हैं जो अपने बच्चों के कारण असह्य पीडा सह रही हैं। मरियम स्त्रियों मे धन्य और एक आदर्श माँ है । इसका अर्थ यह हुआ कि सब विश्वासी स्त्रियां प्रभु यीशु के कारण मरियम की बहने हैं। अतः प्रत्येक मसीही माता के लिये उसके बेटे- बेटियां यीशु के भाई और बहन हैं।एक माँ का ऐसा सोच उसके परिवार के पवित्र परिवार बनने में सहायक होगा।वह उन्हें परमेश्वर की अमानत जान कर परमेश्वर के कार्यों के लिये तैय्यार करेगी। एक माँ के जीवन की सफलता इस बात में है कि उसका बालक बडा हो कर ईश्वर को जो स्वर्ग में है, ” हे पिता ‘ बोल कर सम्बोधन करे।
- यूसुफ : यीशु के पोस-पिता यूसुफ के विषय बाईबल में बहुत कम चर्चा की गयी है। मरियम और यूसुफ दोनों ही यहूदा गोत्र के थे और राजकीय घराने में पले बढे। मरियम की मंगनी यूसुफ के साथ हो चुकी थी। विवाह के पूर्व मरियम के गर्भवती होने की बात जान कर यूसुफ उसे विधिवत त्यागने का निर्णय ले रहा था।लेकिन ठीक समय पर जब जिब्रायेल स्वर्गदूत ने उसे स्वप्न द्वारा दर्शाया कि मरियम के गर्भ में जो बालक है वह किसी पुरुष से नहीं वरन परमेश्वर की ओर से है और वह परमेश्वर का पुत्र कहलायेगा। तब यूसुफ अपना निर्णय त्याग कर मरियम को विधिवत विवाह द्वारा अपनी पत्नि बना लिया। यूसुफ के चरित्र की महानता इस स्थान पर देखी जा सकती है कि उसने स्वर्गदूत की वाणी पर पूर्ण रूपेण विश्वास किया और यह जानते हुए कि यीशु उसका पुत्र नहीं है, उसे इस प्रकार गोद ले कर उसका प्रतिपालन किया कि लोगों ने यीशु को यूसुफ का ही पुत्र जाना।उसके अद्द्भुत उपदेशों को सुन कर एक दूसरे से कहते थे, ” क्या यह यूसुफ का पुत्र यीशु नहीं है, जिसके माता-पिता को हम जानते हैं?” ( यू. 6.42 )। यहाँ एक बात गौर करने की है : एक नश्वर मनुष्य ने शाश्वत परमेश्वर को मानव पुत्र होने के लिये गोद लिया। यह अद्भुत कार्य यूसुफ ने किया जिसके फलस्वरुप आज परमेश्वर हम मनुष्यों को लेपालक ईश्वर-पुत्र होने के लिये गोद ले रहा है। (A greatest adoption story of all time : God was adopted in human family – now man is adopted into the divine family. )
बैतुल्हम में भी यूसुफ का रोल अनोखा था। कोई साथी नहीं,कोई सम्बंधी नहीं,बस केवल वह मरियम के साथ अकेला। मरियम की प्रसव क्रिया में वह एकमात्र सहायक था जो एक धाई ( मिड्वाईफ ) का काम किया। इस प्रकार यूसुफ में हम एक आदर्श पवित्र पति तथा पिता के गुणों को देख सकते हैं जो पुरुषों के लिये अनुकरणीय है।
3.यीशु :- पवित्र परिवार का तीसरा सदस्य यीशु परिवार में पहलौठा पुत्र था। जितने उसके सम्पर्क में आये उन्होंने उसे एक साधारण निम्न म्ध्यवर्गीय व्यक्ति ही जाना। घर मे वह एक आज्ञाकारी पुत्र था । यूसुफ एक कुशल बढई था अतः यीशु उसका सहायक था। कई लोगों ने उसे ‘बढई का पुत्र’ भी कहा।
बारह वर्षीय यीशु का यरुशलीम मन्दिर आने की घटना के पश्चात् उसके तीस वर्ष की आयु तक का वर्णन हमें बाईबल में नहीं मिलता है अतः उस अवधि की बातें हम नहीं कर सकते हैं। कई लोग इस अवधि के विषय तरह तरह की बातें लिखते हैं जिस पर हमें ध्यान देने की आवश्यकता नहीं परन्तु जब लगभग तीस वर्षीय युवा यीशु लोगों के बीच प्रगट हुए तो सब लोग उसके उपदेशों से चकित हो गये।कई लोग आपस में कहने लगे यह तो बढई का बेटा है ,इसके भाई बहनों को भी हम तो जानते हैं, इसे इतना ज्ञान कहाँ से मिला? जब यीशु अन्धों को दृष्टि देने, कुष्ट रोगियों को चंगा करने और मुर्दों को पुनः जीवित करने लगे तब वे असमंजस मे पड गये कि ये कैसा व्यक्ति है और समाज के अगुओं ने उसे पागल कहा।
यीशु सब लोगों के साथ समान व्यवहार करता था लेकिन पापियों के लिये और निम्न वर्ग के लोगों को अधिक समय देता था। उनके संग उठते बैठते और भोजन खाते देख धर्म गुरुओं ने उसे पापियों का मित्र कहा। वह दीन दुखी,गरीब और दलितों पर तरस खाता और उनका पक्ष लेता था ।
साधारणतः माता पिता और बच्चे मिल कर एक परिवार बनाते हैं परन्तु इस सोच को यीशु ने विस्तृत रूप दिया। एक बार एक स्त्री भीड में चिल्ला कर कहने लगी, “ धन्य है वह गर्भ जिसमें तू रहा और वे स्तन जो तुने चूसे” यीशु ने उत्तर देते हुए उससे कहा, “परंन्तुअधिक धन्य वे हैं जो परमेश्वर का वचन सुनते और मानते हैं।“( लूक 11.27 )।एक बार जब यीशु किसी घर में उपदेश दे रहे थे, मरियम यीशु के भाईयों को ले कर वहाँ आयी। किसी ने यीशु को बताया,” देखिये आप की माता और भाई बाहर खडे हैं और आप से बातें करना चाहते हैं”। यीशु ने समाचार देने वाले को उत्तर दिया, “ कौन है मेरी माता और कौन है मेरे भाई? फिर सामने बैठे जन समूह की ओर इशारा करते हुए बोला, ये हैं मेरी माता और मेरे भाई क्योंकि जो व्यक्ति परमेश्वर की इच्छा अनुसार कार्य करे, वही मेरा भाई, मेरी बहन और मेरी माता हैं“ ( लूक 8. 19-21 )। इसका अर्थ यह हुआ कि शारीरिक सम्बंध के अनुसार जिस तरह भाई, बहन, चाचा, भतीजा, मामा भगना और नाती पोते होते हैं, उस रीति परमेश्वर के पवित्र परिवार में नहीं होते हैं।
यीशु के भाई बहन : यीशु अपने पुनरुत्थान के पश्चात् मरियम से कहा, “ …. मेरे भाईयों के पास जाओ …( यू. 20.17)। प्रभु यीशु जो अपने लहू द्वारा हमें पवित्र कर रहा है और हम जो पवित्र हो रहे हैं हमारा पिता एक ही है। यही कारण है कि यीशु हमें अपना भाई कहने से नहीं लजाता है। उसकी उक्ति है, “ देखो, मैं और वे पुत्र, जो परमेश्वर ने मुझको दिये हैं”( ईब्रा.2. 11-13 )। ‘वे पुत्र ‘ विश्वासियों की ओर संकेत करती हैं, जैसा यू. 1.12 में लिखा है, “ जितनों ने उसे स्वीकार किया और उसके नाम पर विश्वास किया, उनको परमेश्वर की संतान बनने का अधिकार दिया” अब हम सब विश्वास द्वारा मसीह यीशु में परमेश्वर की सन्तान हैं( गलाती 3. 26 )।जब हम ने उस पर विश्वास किया तब पिता ने हम पर पवित्रात्मा की मुहर लगा दी ताकि हम उत्तराधिकार में अपनी आत्मिक सम्पति प्राप्त करें ( इफिसी 1.13 )। आत्मा हमारी आत्मा के साथ मिल कर साक्षी देता है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं ( रोमी 8.16 ) पवित्र शास्त्र कहता है “ अब तुम पुत्र हो क्योंकि परमेश्वर ने अपने पुत्र का आत्मा हमारे हृदय में भेजा है जो पुकारता है, ‘ अब्बा, हे पिता ‘ और परमेश्वर द्वारा उत्तराधिकारी भी बनाये गये हो” ( गलाति 4. 6-7 )।
यहाँ हमें इस बात की जानकारी अवश्य है कि जिस तरह यीशु परमेश्वर का पुत्र है,उस तरह हमारा पुत्रत्व नहीं है । शास्त्र में यीशु के विषय लिखा है कि वह पवित्रात्मा द्वारा गर्भवती हुई परंतु हमारे लिये लिखा है, “ मैं अधर्म में उत्पन्न हुआ था और पाप में मेरी माँ ने मुझे गर्भ में धारण किया था” ( भ. स. 51.5 ). हम विश्वास द्वारा मसीह यीशु में परमेश्वर की सन्तान हैं। (गलाति 3.26 ) इस तरह हम यीशु में परमेश्वर के दत्तक अर्थात् लेपालक पुत्र-पुत्रियां हैं( इफिसी 1.5 )
प्रभु की इच्छा है कि हर विश्वासी परिवार पवित्र परिवार बने।
+ O.K.Tirkey